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मुख्यमंत्री ने कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना को देश के बंटवारे का जिम्मेदार ठहराया

मुख्यमंत्री ने कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना को देश के बंटवारे का जिम्मेदार ठहराया

*लखनऊ, 22 दिसंबर।* मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना को सीधे तौर पर भारत के सांस्कृतिक विभाजन और अंततः देश के बंटवारे का जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम पर किया गया समझौ

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satyakee parakh 22 दिसंबर 2025, 17:32 IST
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मुख्यमंत्री ने कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना को देश के बंटवारे का जिम्मेदार ठहराया

*लखनऊ, 22 दिसंबर।* मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना को सीधे तौर पर भारत के सांस्कृतिक विभाजन और अंततः देश के बंटवारे का जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम पर किया गया समझौता किसी धार्मिक भावना का सम्मान नहीं, बल्कि कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का पहला, सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक प्रयोग था, जिसने अलगाववाद को जन्म दिया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जब तक मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस में थे, तब तक वंदे मातरम कोई विवाद नहीं था। कांग्रेस छोड़ते ही जिन्ना ने इस राष्ट्रगीत को मुस्लिम लीग की राजनीति का औजार बनाया और जानबूझकर इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। गीत वही रहा, लेकिन एजेंडा बदल गया।
*कांग्रेस नेतृत्व राष्ट्र की बजाय वोटबैंक के साथ रहा*
सीएम योगी ने कहा कि 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ से जिन्ना ने वंदे मातरम के विरुद्ध नारा बुलंद किया, जबकि उस समय कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। इसके तुरंत बाद 20 अक्टूबर 1937 को नेहरू द्वारा सुभाष चंद्र बोस को लिखा गया पत्र, जिसमें कहा गया कि यह मुद्दा मुसलमानों को “आशंकित” कर रहा है, कांग्रेस के तुष्टीकरण की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है। उन्होंने कहा कि 26 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस ने वंदे मातरम के कुछ अंश हटाने का निर्णय लिया, जिसे उस समय “सद्भाव” कहा गया, लेकिन वास्तव में यह राष्ट्र चेतना की बलि थी। देशभक्तों ने इसका विरोध किया, प्रभात फेरियां निकाली गईं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व राष्ट्र के साथ खड़ा होने की बजाय वोटबैंक के साथ खड़ा हो गया।

*वंदे मातरम का विरोध पूरी तरह राजनीतिक*
मुख्यमंत्री ने कहा कि 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने मांग की कि वंदे मातरम पूरा बदला जाए, लेकिन कांग्रेस ने प्रतिकार नहीं किया। परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग का साहस बढ़ता गया, अलगाववाद की धार तेज हुई और सांस्कृतिक प्रतीकों पर पहला समझौता हुआ, जिसने अंततः भारत के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन की नींव रखी। सीएम योगी ने स्पष्ट कहा कि वंदे मातरम का विरोध न तो धार्मिक था और न ही आस्था से जुड़ा, बल्कि यह पूरी तरह राजनीतिक था। उन्होंने याद दिलाया कि 1896 से 1922 तक कांग्रेस के हर अधिवेशन में वंदे मातरम गाया जाता रहा। न कोई फतवा था, न कोई धार्मिक विवाद। खिलाफत आंदोलन तक भी यह गीत हर मंच से गूंजता था। मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता इसके समर्थक थे। समस्या मजहब को नहीं, बल्कि कुछ लोगों की राजनीति को थी।

*कांग्रेस का राष्ट्रीय आत्मसमर्पण*
मुख्यमंत्री ने बताया कि 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में मोहम्मद अली जौहर ने पहली बार वंदे मातरम का विरोध किया। यह विरोध धार्मिक नहीं, बल्कि खिलाफत की राजनीति से प्रेरित था। जब विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने पूरा गीत गाया तो जौहर मंच छोड़कर चले गए। मंच छोड़ना उनका व्यक्तिगत निर्णय था, लेकिन कांग्रेस का झुकना उसकी नीति बन गई। सीएम योगी ने कहा कि इसके बाद कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के पक्ष में मजबूती से खड़े होने की बजाय समितियां बनाईं और अंततः 1937 में फैसला हुआ कि केवल दो छंद गाए जाएंगे और वह भी अनिवार्य नहीं होंगे। इसे उन्होंने राष्ट्रीय आत्मसमर्पण बताया।
*वंदे मातरम केवल गीत नहीं, भारत की आत्मा*
मुख्यमंत्री ने कहा कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा द्वारा जिस खंडित वंदे मातरम को मान्यता दी गई, वह भी कांग्रेस की इसी तुष्टीकरण नीति का परिणाम था। राष्ट्र ने गीत को अपनाया, लेकिन कांग्रेस पहले ही उसे काट चुकी थी। सीएम योगी ने कहा कि वंदे मातरम केवल गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। 1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक, यह प्रभात फेरियों, सत्याग्रहों और क्रांतिकारियों की अंतिम सांस तक का मंत्र रहा। रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे भारत की आत्मा, अरविंद घोष ने इसे मंत्र कहा। मैडम भीकाजी कामा द्वारा फहराए गए पहले विदेशी तिरंगे पर वंदे मातरम लिखा था, मदनलाल ढींगरा के अंतिम शब्द भी वंदे मातरम थे।
*राष्ट्रगीत के बाद आज राष्ट्रभाव को कमजोर करने की कोशिश*
मुख्यमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम के साथ किया गया समझौता केवल गीत का अपमान नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय दिशा पर किया गया क्रूर प्रहार था। उन्होंने चेतावनी दी कि आज भी कुछ राजनीतिक शक्तियां उसी विभाजनकारी सोच को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही हैं। तब राष्ट्रगीत को निशाना बनाया गया था, आज राष्ट्रभाव को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वंदे मातरम का अर्थ केवल मातृभूमि को प्रणाम करना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा, समृद्धि और गौरव का संकल्प लेना है। तुष्टीकरण की ऐतिहासिक भूलों से सीख लेकर ही श्रेष्ठ, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण संभव है। उन्होंने सदन से आह्वान किया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘आनंद मठ’ का अध्ययन कर राष्ट्र चेतना को समझा जाए और वंदे मातरम के 150 वर्ष को भविष्य के संकल्प के रूप में अपनाया जाए।

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satyakee parakh संपादक

सत्य की परख — लखनऊ से समाचार।

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